।। 22 अप्रैल 2016 से शुरू होगा सिंहस्थ महापर्व।।

” मेष राशि गते सूर्ये सिंह राशौ बृहस्पतौ । उज्जियन्यां भवेत कुम्भः सदामुक्ति प्रदायकः ।।

सिंह राशि में बृहस्पति एवं मेष राशि में सूर्य का प्रवेश होने पर सिंहस्थ महापर्व उज्जैन में होता है। 22 अप्रैल 2016 से पर्व का सिलसिला शुरू होने जारहा है। पर्व मैं हर दिन खास होगा फिर भी कुछ विशेष तिथियों पर ख़ास स्नान और इसके अलावा शाही स्नान और साधुओं की पेशवाई सिंहस्थ पर मैं आकर्षण का केंद्र बनी रहेगी। ऐसे मौकों पर साधु संतों की गतिविधियाँ तीर्थयात्रियों और पर्यटकों के आकर्षण बन उन्हें अपनी और केंद्रित करेगी। सिंहस्थ के मौके पर तेरह अखाड़ों के साधु-संत सिंहस्थ स्थल पर एकत्र होते हैं। प्रमुख स्नान के दिन अखाड़ों के साधु एक शानदार शोभायात्रा के रूप में शाही स्नान के लिए आते हैं। भव्य जुलूस में अखाड़ों के प्रमुख महंतों की सवारी सजे धजे हाथी, पालकी या भव्य रथ पर निकलती हैं। उनके आगे पीछे सुसज्जित ऊँट, घोड़े, हाथी और बैंड़ भी होते हैं। उज्जैन की सड़कों से निकलती इस यात्रा को देखने के लिए लोगों के हुजूम इकट्ठा होगा। ऐसे में इन साधुओं की जीवन शैली सबके मन में कौतूहल जगाती है।

।।नागा साधु का सिंहस्थ मैं विशेष महत्त्व।।

सिंहस्थ में शैवपंथी नागा साधुओं को देखने के लिए भीड़ उमड़ पड़ती है। नागा साधुओं की रहस्यमय जीवन शैली और दर्शन को जानने के लिए विदेशी श्रद्धालु ज्यादा उत्सुक रहते हैं। कुम्भ के सबसे पवित्र शाही स्नान में सबसे पहले स्नान का अधिकार इन्हें ही मिलता है। नागा साधुओं का रूपनागा साधु अपने पूरे शरीर पर भभूत मले, निर्वस्त्र रहते हैं। उनकी बड़ी-बड़ी जटाएं भी आकर्षण का केंद्र रहती है। हाथों में चिलम लिए और चरस का कश लगाते हुए इन साधुओं को देखना अजीब लगता है। मस्तक पर आड़ा भभूत लगा, तीन धारी तिलकलगा कर धूनी रमा कर, नग्न रह कर और गुफ़ाओं में तप करने वाले नागा साधुओं का उल्लेख पौराणिक ग्रंथों में भी मिलता है। यह साधु उग्र स्वभाव के होते हैं। नागा जीवन की विलक्षण परंपरा में दीक्षित होने के लिए वैराग्य भाव का होना जरूरी है। संसार की मोह-माया से मुक्त कठोर दिल वाला व्यक्ति ही नागा साधु बन सकता है। साधु बनने से पूर्व ही ऐसे व्यक्ति को अपने हाथों से ही अपना ही श्राद्ध और पिंड दान करना होता है। अखाड़े किसी को आसानी से नागा रूप में स्वीकार नहीं करते। बाकायदा इसकी कठोर परीक्षा ली जाती है जिसमेंतप, ब्रह्मचर्य, वैराग्य, ध्यान, सन्न्यास और धर्म का अनुशासन तथा निष्ठा आदिप्रमुखता से परखे-देखे जाते हैं। कठोर परीक्षा से गुजरने के बाद ही व्यक्ति सन्न्यासी जीवन की उच्चतम तथा अत्यंत विकट परंपरा में शामिल होकर गौरव प्राप्त करता है। इसके बाद इनका जीवन अखाड़ों, संत परंपराओं और समाज के लिए समर्पित हो जाता है।

।।नागा साधु का इतिहास ।।

शंकराचार्य ने सनातन धर्म की रक्षा के लिए सन्न्यासी संघों का गठन 547 ईस्वी मैं किया था। बाहरी आक्रमण से बचने के लिए कालांतर में सन्न्यासियों के सबसे बड़े संघ जूना अखाड़े में सन्न्यासियों के एक वर्ग को विशेष रूप से शस्त्र-अस्त्र में पारंगत करके संस्थागत रूप प्रदान किया। वनवासी समाज के लोग अपनी रक्षा करने में समर्थ थे, और शस्त्र प्रवीण भी। इन्हीं शस्त्रधारी वनवासियों की जमात नागा साधुओं के रूप में सामने आई। ये नागा जैन और बौद्ध धर्म भी सनातन हिन्दू परम्परा से ही निकले थे। वन, अरण्य, नामधारी सन्न्यासी उड़ीसा के जगन्नाथपुरी स्थित गोवर्धन पीठ से संयुक्त हुए। आज संतों के तेरह अखाड़ों में सातसन्न्यासी अखाड़े (शैव) अपने-अपने नागा साधु बनाते हैं। ये हैं सात अखाड़े जू ना, महानिर्वणी, निरंजनी, अटल, अग्नि, आनंद और आवाहन अखाड़ा।

।।पड़े अगली स्टोरी उज्जैन मैं होती है खूनी नागा की दीक्षा ।।

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